राव जगमाल जी कछवाहा
खंगारोत वंश के पूर्व पुरुष राव जगमाल जी आमेर नरेश राजा पृथ्वीराज के पुत्र थे। इनकी माँ बाला बाई बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री थी और राजा पृथ्वीराज की प्रधान पत्नी थी। डीग्गी ठिकाना रिकॉर्ड के अनुसार जगमाल कछवाहा का जन्म विक्रम संवत 1564 ( 1507 ई ) में हुआ था।
पृथ्वीराज के पुत्रों में जगमाल कछवाहा का जन्म के अनुसार कौनसा क्रम था इस बारे में इतिहासकार एकमत नही है। नाथवतो के इतिहास ( पृष्ठ 42 ) के अनुसार इनका क्रम छठा था तो वीर विनोद ( भाग 2, पृष्ठ 1273 ) के अनुसार आठवाँ। जगमाल जी बचपन से ही बहुत वीर और पराक्रमी थे। ये अपने पिता के साथ राजा पृथ्वीराज के साथ राणा सांगा की और से बाबर के विरुद्ध 1527 ई के प्रसिद्व खानवा के युद्ध मे लड़े थे। यह उनके यशस्वी जीवन का पहला महत्वपूर्ण युद्ध था।
जैसा कि सभी जानते है कि राजा पृथ्वीराज के पुत्रो के प्राप्त जागीरे ही लोक में " बारह कोटड़ीयो " के नाम से प्रसिद्ध हुई। इनमे जगमाल जी को निर्वाह हेतु साईंवाड का परगना मिला जिसकी पुष्टि वीर विनोद तथा अन्य इतिहास के ग्रंथों व ख्यातों से होती है।
स्वभावतः वीर और महत्वकांशी जगमाल जी ने अपने पिता द्वारा दिए गए साईंवाड के पट्टे को शिरोधार्य तो किया पर उसे अपने जीविका निर्वाह हेतु अपर्याप्त समझकर आधा चारणों को एवं आधा पुरोहितो को दान में दे दिया। इस प्रकार का दान उस युग की परम्परा के अनुरूप था। उस समय यह सामान्य धारणा थी कि अपना राज्य ब्राह्मणों या चारणों अथवा किसी अन्य निकट संबधी आदि को देने की उपरांत भुजबल से जो नया स्थापित किया जाता है वो चिरस्थायी रहता हैं।
तदनंतर आने बाहुबल से अर्जित धरित्री ही अपने उपभोग्य समझ वे एक नए भूभाग पर अधिकृत करने हेतु निकल पड़े। जगमाल जी ने भीषण युध्दों ओ संघर्ष के बाद अपने वीर पुत्रो खंगार जी, सिंहदेव ( सिंघा जी ), जय सिंह ( जैसा जी ), सारंगदेव जी और रामचंद्र जी की सहायता से नारायणा, कालख, बोराज, जोबनेर आदि के तत्कालीन शासको को युद्ध मे परास्त कर इस समस्त भूभाग पर अपना अधिकार कर लिया। उस समय इस भूभाग पर राव हम्मीर व राव अल्हण के वंशजों ( हमीरदेका कछवाहों व जोगी कछवाहों ) का राज्य था।
पहला भीषण युद्ध संवत 1606 ( 1549 ई ) में बोराज में आल्हनदेव के वंशजो से हुआ। इस युद्ध मे जगमाल जी विजयी तो हुए पर उनके तीन पुत्रो जैसा जी, सिंघा जी एवं सारंगदेव जी वीरतापूर्वक लड़ते हुए काम आए। इनमे से सिंघा जी का चबूतरा बोराज गढ़ की पहाड़ी पर बना है तथा सारंग जी का चबूतरा बांडी नदी के किनारे बोराज जोबनेर मार्ग पर अवस्थित है। इस चबूतरे के पास एक बहुत पुराना वट वृक्ष था जो अभी कुछ साल पहले टूट गया । यह वट सारंगवट के नाम से प्रसिद्ध था। ये भी भोमिया के रूप में पूजे जाते है।
इसके बाद जगमाल जी ने अपने दोनों जीवित पुत्रो खंगार जी और रामचंद्र जी की सहायता से जोबनेर पर आक्रमण किया और वहा पर अधिकार कर लिया। जोबनेर का तत्कालीन शासक तेज सिंह हमीरदेका इस लड़ाई में मारा गया।
इस अवसर पर जगमाल जी ने रोहड़िया शाखा के किशना बारहठ को अपना पोलपात बनाया तथा उन्हें संवत 1616 आषाढ़ सुदी 5 को सात गांव नगरी, तुंदेडा, आकतड़ी, डोस्या, टूंटीबड़ी, डोगरया व रोटपुरा दान में दिए।
तदन्तर जगमाल जी ने अपने नाम से जोबनेर के पश्चिम की ओर तथा बादशाही तहसील के निकट जगमालपुरा गांव बसाया जो आज भी इसी नाम से विद्यमान है।
राव जगमाल जी एक आदर्श पुरुष थे। राजा पृथ्वीराज चाहते थे की उनके देहांत के बाद उनके स्थान पर उनके बड़े पुत्र भीव सिंह के बजाय उनके ही दूसरे पुत्र पूर्णमल आमेर के गद्दी पर बैठे। राव जगमाल जी अपने पिता के इस विचार से सहमत नही थे। वह चाहते थे कि बड़े बेटे को ही गद्दी पर बैठने का अधिकार दिया जावे। जिससे राजा पृथ्वीराज राव जगमाल जी से ही रुष्ट हो गए और उनसे कहा कि जब तक मे जिंदा हु तुम आमेर में मेरी आँखों के सामने नही आओगे। जगमाल जी ने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर पुरषोत्तम श्री राम का अनुसरण किया और वे आमेर छोड़कर चले गए। आमेर से राव जगमाल जी महाराणा सांगा के पास चले गए जहाँ उन्हें सामन्तो में स्थान मिला और मांडल की जागीर मिली। शायद यही कारण है जिसके कारण राव जगमाल जी ने अपने पिता द्वारा दी गयी साईंवाड की जागीर को ब्राह्मणों और चारणों में दान कर दी।
राव जगमाल जी ने महाराणा सांगा के नेतृत्व में बाबर से खानवा के मैदान में युद्ध किया।
राजा पृथ्वीराज जी की मृत्यु के पश्चात आमेर के राजा पूर्णमल बने पर वे थोड़े समय ही रहे उनके बाद उनके भाइयों में उत्तराधिकार की लड़ाई होने लगी तो जगमाल जी ने उन्हें मेवाड़ से आकर समझाया और भीव सिंह को आमेर का राजा बना दिया। किन्तु वे भी थोड़े ही समय की बाद मृत्यु को प्राप्त हुए और उनके बाद रतन सिंह राजा हुए और वे भी कुछ दिन बाद मारे गए। जगमाल जी ने आमेर की गद्दी पर अपना उच्च पेश किया किन्तु भाइयों में अधिक विग्रह फैलेते देख वे इस उत्तराधिकार की लड़ाई के मैदान से हट गये और भारमल आमेर के राजा बने। इस प्रकार भाइयों के टकराव से अपने आपको बचाकर जगमाल जी ने एक आदर्श व्यक्तित्व स्थापित किया।
जगमाल जी की वीरता और त्याग से प्रभावित होकर हुमायूं ने उन्हें दिल्ली के लिए आमंत्रित किया। जब जगमाल जी ने दिल्ली से कुछ दूर जंगल मे जाकर अपने पड़ाव डाला और रात्रि विश्राम किया तो देव संजोग से हुमायूँ जो जंगल में शिकार खेलने गया हुआ था, आंधी और बरसात की चपेट में आ गया, साथियों का साथ छूट गया और भटकते हुए गिले कपड़ो में काँपते हुए जगमाल जी के डेरे में पहुच गया। उसने जगमाल जी को अपना भेद नही दिया। लेकिन जगमाल जी ने मानवता के नाते हुमायु को सूखे कपड़े पहने को दिए और विश्राम करवया। रात्रि भोज के लिए जगमाल जी की सैनिको के लिए राबड़ी बनाई गई थी। जगमाल जी ने उसी राबड़ी का एक तासला हुमायु को दिया तो हुमायूँ उस राबड़ी को पीने से ऐसा मस्त हो गया कि वो राव जगमाल जी का जिगरी दोस्त बन गया और सुबह जाने के वक्त जगमाल जी को दिल्ली ले जाकर नारायण और नागौर का पट्टा दिया ( नारायण कालख बोराज और जोबनेर जगमाल जी ने अपने दम पर अपने बेटों के साथ जीता था जिसका बाद में हुमायूँ ने पूर्ण स्वामित्व का पट्टा दिया अर्थात यहा के शासक सीधे दिल्ली के अधीन रहेगे ना कि आमेर ) और सेना में उच्च पद पर नियुक्त किया।
डिग्गी ठिकाने के रेकॉर्ड के अनुसार राव जगमाल जी के 9 विवाहों से 5 पुत्र हुवे। उनकी रानियों का उल्लेख इस प्रकार है :-
1. सोडी उमरकोट के सूरजमल की बेटी नेत कंवर
2. करणोत चंद्र कंवर
3. भटियाणी जैसलमेर के रावल संग्राम सिंह की बेटी बरखावती
4. राठौड़ पोकरण के खींवकर्ण की बेटी बोरंगदे
5. राठौड़ मेड़ता के दूदाजी के बेटी और राव जोधाजी की पोती किसनावती
6. चौहान बुडसु के बलकरण की बेटी बोरंगदे
7. सोढ़ी गगराना की महेसदासजी की बेटी दलपत सिंह की पोती सदा कंवर
8. चौहान चितावा के करण सिंह की बेटी
9. चौहान परबतसर की
जगमाल जी के इन विवाहो से 5 पुत्र राव खंगार जी, रामचंद्र जी, सिंहदेव जी, जयसिंह जी और सारंगदेव जी हुए। जगमाल जी के इन विवाह संबंधो में दो विशेष महत्व रखते है - एक अमरकोट के सोढो के यहाँ तथा दूसरा राव दूदा के यहाँ।
राव जगमाल जी का अमरकोट का विवाह संबंध राजनेतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रखता है। कारण मुग़ल सम्राट अकबर का जन्म अमरकोट के दुर्ग में ही हुआ था जहाँ के राजा प्रसाद ( सूरजमल ) की पुत्री से जगमाल जी का विवाह हुआ था। संवत 1599 ( 1542 ई ) में शेरशाह सूरी द्वारा खदेड़े जाने पर जब हुमायु अपनी गर्भवती बेगम हमीदाबानू को साथ लिए आश्रय की खोज में भटकता हुवा जोधपुर पहुँचा तो वहाँ के राव मालदेव ने उसके सैनिको द्वारा गाये पकड लिए जाने पर आपत्ति जताते हुए उसे शरण देने दे इनकार कर दिया। इसके बाद हुमायु जैसलमेर पहुचा वहां भी उसे निराश हाथ लगीं। वहां के राव लूणकरण ने उसके बिना इजाजत जैसलमेर में प्रवेश करने पर आपत्ति प्रकट की। इस पर मुसीबत का मारा हुमायु अमरकोट पहुचा जहाँ के सोढा राजा प्रसाद ने हुमायूँ का स्वागत किया उसे राजसी ठाट-बाट से अपने यहाँ रखा तथा अपने 2000 सवारो की सैनिक सहायत उसे प्रदान की ताकि वह ठट्टा और भक्कर के किलो पर अधिकार कर सके।
जनश्रुति के अनुसार अमरकोट में हुमायु को शरण दिलाने में वहां के सोढा राजा की पुत्री एवं राव जगमाल जी की पत्नी रानी नेत कंवर ( आसलदे - इन्ही रानी के नाम से आसलपुर बसाया गया है जिसकी जागीर बाद में राव खंगार जी के पौत्र एवं राव मनोहरदास जी के पुत्र रतन सिंह जी खंगारोत को मिली पर उनके संतान ना होने के कारण आसलपुर जयपुर रियासत द्वारा खालसा कर लिया गया ) का विशेष हाथ था। उन दिनों सोढ़ी रानी अपने पीहर आई हुई थी एवम जब हुमायु ने अमरकोट दुर्ग में शरण चाही तो वहा के राजा ने पहले उसे शरण देने में आनाकानी की। इस पर सोढ़ी रानी ने अपने पिता को समझाया कि शरण मे आए हुए को शरण ना देना कायरता है। इससे सोढो के उज्वल कीर्ति पर कलंक लगेगा। अतः आपको इस संबंध में तनिक भी हिचकिचाहट नही रखनी चाहिए और यश लाभ के इस स्वर्ण अवसर को हाथ से नही जाने देना चाहिए । यही नही राव जगमाल जी की सोढ़ी रानी ने हमीदा बानो के प्रसव काल मे स्वंय उसकी देखभाल की। अमरकोट के दुर्ग में हमीदा बानो व बालक अकबर सोढ़ी रानी की निगरानी में ही रहे। अकबर भी राव जगमाल जी की इस रानी के उपकार को भुला नही तथा इस सम्बंध की वजह से वह जगमाल जी को बाबा कहकर पुकारता था।
लेकिन युद्धक्षेत्र में प्रदर्शित वीरता के अतिरिक्त अन्य किसी कारण से किसी को कुछ देना अकबर के स्वभाव के विपरीत था। आमेर नरेशों पर भी अकबर की असीम कृपा का कारण उन नरेशों का उदभट शौर्य और पराक्रम ही था। तथापि उस विषय परिस्थिति में अपने माता-पिता को आश्रय दिए जाने के कारण रानी सोढ़ी के सम्बंध में राव जगमाल जी के प्रति अकबर का विशेष आदर रहना स्वभाविक था।
जगमाल जी का एक विवाह राव दूदा की पुत्री से भी हुआ था। राजस्थान की प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवयित्री मीराबाई के घराने से संबंधित होने के कारण यह विवाह संबंध भी अत्यधिक महत्वपूर्ण था।
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